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Showing posts from April, 2022
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  वेद:- वेदों के द्वारा प्राचीन आर्यों के सामाजिक , आर्थिक , धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलती है। वैदिक युग की सांस्कृतिक दशा के ज्ञान का एकमात्र स्रोत वेद है। वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद तथा अथर्ववेद चारों वेदों को ' संहिता ' कहा जाता है। वेदों को अपौरुष्य कहा जाता है।   ऋग्वेद (1500 ई.पू.- 1000 ई.पू.):- यह सबसे प्राचीनतम वेद माना जाता है। समस्त आर्य जाती की प्राचीनतम रचना । इसकी रचना पंजाब या गंगा यमुना के दोआब में की थी । यह एक ऐसा वेद है जो ऋचाओं में   क्रमबद्ध है । ऋग्वेद में कुल 10 मंडल , 1028 सूक्त एवं 10,580 ऋचाएँ हैं। इस वेद के पढ़ने वाले ऋषि को ' होतृ ' कहते हैं। ऋग्वेद का पहला एवं 10 वाँ मंडल सबसे अंत में जोड़ा गया है। ऋग्वेद के तीसरे मंडल में सूर्य देवता ' सविता या सावित्री ' को समर्पित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है। आठवें मंडल की हस्तलिखित ऋचाओं को खिल  कहा जाता है।  9 वें मंडल में देवता सोम का उल्लेख है तथा 10 वाँ मंडल चार्तुवर्ण्य या चातुष्वर्ण्य समाज की संकल्पना (चार वर्ण ब...

प्राचीन साहित्यिक स्रोतों के बारे में परिचय

  साहित्यिक स्रोत:- साहित्यिक स्रोत के अंतर्गत हम धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य का अध्ययन करते हैं। धार्मिक साहित्य में ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर ग्रंथों की चर्चा की जाती है। ब्राह्मण ग्रंथों में वेद , उपनिषद , रामायण , महाभारत , पुराण तथा स्मृति ग्रंथ आते हैं , जबकि ब्राह्मणेत्तर ग्रंथों में बौद्ध तथा जैन साहित्यों से संबंधित रचनाओं का उल्लेख किया जाता है। लौकिक साहित्य में ऐतिहासिक ग्रंथों , जीवनियाँ , यात्रा - वृत्तांत , कल्पना-प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन किया जाता है । साहित्यक स्रोत:- भारतीय साहित्य विदेशीयों का  विवरण भारतीय साहित्य:- धार्मिक साहित्य धर्मनिरपेक्ष साहित्य संगम साहित्य धार्मिक साहित्य:- ब्राह्मण साहित्य बौद्ध साहित्य जैन साहित्य ब्राह्मण साहित्य:- वेद ब्राह्मण ग्रंथ आरण्यक उपनिषद वेदांग उपवेद षड्दर्शन महाकाव्य पुराण स्मृति    वेद(4) ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेय कौषितकी गोपथ आदि।         आरण्यक तैत्तिरिय मैत्रायणी ऐतरेय आदि। उपनिषद छान्दोग्य कण्ठ वृहदारण्यक आदि। वेदांग(6) शि...

मुहरें

मुहरें:- अवशेषों से प्राप्त मुहरों से प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में बहुत सहायता मिलती है। मुहरों से व्यापारिक , धार्मिक , आर्थिक जीवन के बारे में पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है। हड़प्पा , मोहनजोदड़ो और बसाढ़ से प्राप्त मिट्टी की मुहरों में बने धार्मिक प्रतीकों से उनके धार्मिक अवस्थितियों का ज्ञान होता है।

चित्रकला

  चित्रकला:- अजंता (माहाराष्ट्र) के चित्रों में मनोभावों की सुंदर झलक मिलती है। चित्रकला में ' माता और शिशु ' तथा ' मरणासन्न राजकुमारी ' जैसे चित्रों से गुप्त काल की कलात्मक उन्नति का पूर्ण आभास होता है। बोधिसत्व पद्मपाणि का चित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रायः चित्रित चित्रकारी है , जो अजंता में है।

मूर्तियाँ

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मूर्तियाँ :- प्राचीन भारतीय इतिहास में मूर्तियों का निर्माण कुषाण काल से आरंभ होता है। कुषाणकालीन मूर्तियों पर वैदेशिक प्रभाव है , जबकि मथुरा कला पूर्णतः स्वदेशी है। भरहुत , बोधगया , साँची तथा अमरावती की मूर्तिकला में जनसाधारण के जीवन की अति सजीव झलक देखने को मिलती है।

सिक्के(Coins)

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सिक्के:- अभिलेख , स्मारक और भवन के अतिरिक्त प्राचीन राजाओं द्वारा ढलवाए गए सिक्कों से भी प्रचुर ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध होती है। साधारणतया 206 ई.पू. से लेकर 300 ई. तक के भारतीय इतिहास का ज्ञान हमें मुख्य रूप से मुद्राओं की सहायता से ही होता है। कुछ प्राप्त मुद्राओं में तिथियाँ भी खुदी हैं, जो कालक्रम निर्धारण में अत्यंत सहायक सिद्ध हुई हैं। भारत के सिक्कों की प्राचीनता 8 वीं शती तक जाती है। ईसा पूर्व 6 ठी शताब्दी से नियमित सिक्के मिलने लगते हैं। पुराने सिक्के तांबा , चांदी , सोना और सीसा धातु के बनते थे।    आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्क:- प्राचीनतम सिक्कों को  ' आहत सिक्के या पंचमार्क   '   कहा जाता है। साहित्य में इन्हें काषार्पण, पुराण, धरण, शतमान आदि कहा गया। ये अधिकांशत: चांदी के बने होते थे। ई. पू. पाँचवीं सदी के हैं। ठप्पा मारकर बनाए जाने के कारण ही भारतीय भाषाओं में इन्हें ' आहत मुद्रा ' कहते हैं । पंचमार्क या आहत सिक्कों पर पेड़ , मछली , साँड़ , हाथी , अर्द्धचंद्र आदि के चिह्न बने होते थे। सर्वाधिक सिक्के मौर्योत्तर काल में बने हैं ,...

स्मारक एवं भवन

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स्मारक एवं भवन:- स्मारक और भवनों से जनता की आध्यात्मिकता तथा धर्मनिष्ठा का ज्ञान होता है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त भवनों से 5,500 वर्ष पुरानी सैंधव सभ्यता का पता चला है। (नवीन शोध के अनुसार , सिंधु घाटी सभ्यता लगभग 8,000 साल पुरानी है। ) अतरंजीखेड़ा (उ. प्र.) आदि की खुदाईयों से पता चलता है कि ई. पू. ईसा पूर्व 1000 के लगभग देश में लोहे का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। प्राचीन काल में भारत में भारी संख्या में मंदिरों का निर्माण हुआ , जिनके अवशेष बिखरे रूप में पूरे देश में हैं। महलों और मंदिरों की शैली से वास्तुकला के विकास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। विभिन्न स्थानों से प्राप्त मंदिर:- देवगढ़ का दशावतार मंदिर (झाँसी) भीतरगाँव का मंदिर (कानपुर) अजंता की गुफाओं के चित्र सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की ताम्रमूर्ति आदि । इससे हिंदू कला एवं सभ्यता के पर्याप्त विकसित होने के प्रमाण मिलते हैं। भारत में मंदिरों की शैली:- उत्तर भारत के मंदिर ' नागर शैली ' मध्य भारत के मंदिर ' बेसर शैली ' दक्षिण भारत के मंदिर ' द्रविड़ शैली...

प्राचीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत या साधन

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प्राचीन भारतीय इतिहास जानने के स्रोत:- अध्ययन की सुविधा के उद्देश्य से हम उन्हें मोटे-मोटे रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं- पुरातत्त्वसंबंधी सामग्री या स्रोत साहित्यिक स्रोत   विदेशी यात्रियों का विवरण इन तीनों श्रेणियों को फिर अनेक छोटी-छोटी श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

प्राचीन भारतीय इतिहास का परिचय

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प्राचीन भारतीय इतिहास ( Ancient Indian History) :- इतिहास अतीत में किये गए मानव प्रयास की इतिहास के आवश्यक अंग हैं- अतीत सभ्य युग मानव प्रयास  घटनाओं का आनुक्रमिक प्रसार  ' वर्तमान ' जो अभी जीवित है , इतिहास का विषय नहीं है। यद्यपि वह शीघ्र अतीत होकर उसका अंग हो जाएगा। जब हम ऐतिहासिक क्रम में घटनाओं का वर्णन करते हैं तब उन्हें काल-प्रसार में वितरित करते हैं और जब भौगोलिक क्रम से इनका उल्लेख करते हैं तब उन्हें स्थानानुसार रखते हैं। इतिहास और भूगोल दोनों कारण और परिणाम के साथ घटनाओं की तिथि और स्थान को व्यवस्था प्रदान करते हैं। अतः निरन्तरता व परिवर्तनीयता का समसामयिक विश्लेषण ही इतिहास है। इतिहास हमारी और हमारे समाज की दशा व दिशा का निर्धारण करता है और भविष्य को सुरक्षित बनाने का प्रयास करता है। प्राचीन भारत का इतिहास मानव सभ्यता के उस समय का इतिहास है , जब वह अपने निर्माण की अवस्था में था। विशाल पर्वतमालाओं और नदियों की भूमिका प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में बहुत महत्त्वपूर्ण रही है। वर्तमान मानव का स्वरूप क्रमिक विकास का परिणाम है। इति...