सिक्के(Coins)
अभिलेख, स्मारक
और भवन के अतिरिक्त प्राचीन राजाओं द्वारा ढलवाए गए सिक्कों से भी प्रचुर ऐतिहासिक
जानकारी उपलब्ध होती है।
साधारणतया 206 ई.पू. से लेकर 300 ई. तक
के भारतीय इतिहास का ज्ञान हमें मुख्य रूप से मुद्राओं की सहायता से ही होता है।
कुछ प्राप्त मुद्राओं में तिथियाँ भी खुदी हैं, जो कालक्रम निर्धारण में अत्यंत
सहायक सिद्ध हुई हैं।
भारत के सिक्कों की प्राचीनता 8 वीं शती तक जाती
है।
ईसा पूर्व 6 ठी शताब्दी से नियमित सिक्के मिलने
लगते हैं।
पुराने सिक्के तांबा, चांदी, सोना और सीसा धातु के बनते थे।
आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्क:-
- प्राचीनतम सिक्कों को 'आहत सिक्के या पंचमार्क ' कहा जाता है।
- साहित्य में इन्हें काषार्पण, पुराण, धरण, शतमान आदि कहा गया।
- ये अधिकांशत: चांदी के बने होते थे।
- ई. पू. पाँचवीं सदी के हैं।
- ठप्पा मारकर बनाए जाने के कारण ही भारतीय
भाषाओं में इन्हें 'आहत मुद्रा' कहते हैं ।
- पंचमार्क या आहत सिक्कों पर पेड़, मछली, साँड़, हाथी, अर्द्धचंद्र आदि के चिह्न बने होते थे।
सर्वाधिक सिक्के मौर्योत्तर
काल में बने
हैं, जो मुख्यतः सीसे, चांदी,
तांबा एवं सोने के हैं।
सातवाहनों ने सीसे तथा गुप्त
शासकों ने सोने के सर्वाधिक सिक्के जारी किये।
सिक्कों पर लेख लिखने का कार्य
यवन शासकों ने किया।
सर्वप्रथम समुद्रगुप्त
की वीणा बजाते हुए मुद्रा वाले सिक्के से उसके संगीत प्रेमी होने का प्रमाण
मिलता है।
पूर्व मध्यकाल के प्रथम चरण में सिक्कों का आभाव
व दूसरे चरण में वापिस मिलने लगते हैं।
कनिष्क के सिक्कों से बौद्ध अनुयायी
होने का पता चलता है।
सातवाहन नरेश सातकर्णी की एक मुद्रा
पर जलपोत का चित्र मिलता है।
इंडो बैक्टीरिया शासकों के बारे में जानकारी सिक्कों से ही प्राप्त होती है।
नोट: सिक्कों का अध्ययन
'न्यूमिस्मेटिक्स' कहलाता है।
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