भारत में लोहे की प्राचीनता
भारत में लोहे की प्राचीनता
सिन्धु घाटी की सभ्यता कांस्यकालीन है। इसके बाद भारत में लौह युग का प्रारम्भ होता है।
भारत में लोहे की प्राचीनता सिद्ध करने के लिये हमें साहित्यिक तथा पुरातात्विक दोनों ही प्रमाणों से सहायता मिलती है।
विदेशी मत:-
कुछ विद्वानों का मत है कि विश्व में सर्वप्रथम हित्ती नामक जाति, जो एशिया माइनर (टर्की) में ई० पू० 1800-1200 के लगभग शासन करती थी, ने ही लोहे का प्रयोग किया था। उनका एक शक्तिशाली साम्राज्य था। ई० पू० 1200 के लगभग इस साम्राज्य का विघटन हुआ और इसके बाद ही विश्व के अन्य देशों में इस धातु का प्रचलन हुआ। अतः ई० पू0 1200 के पहले हम भारत में भी लोहे के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते हैं।
किन्तु लोहे पर हित्ती एकाधिकार की बात अब तर्कसंगत नहीं प्रतीत होती। उल्लेखनीय है कि थाईलैंड में बानेची नामक पुरास्थल की खुदाई से स्तरीकृत संदर्भों में ढला हुआ लोहा मिलता है जिसकी तिथि ईसा पूर्व 1600-1200 के मध्य निर्धारित की गयी है। इस प्रमाण से लोहे पर हित्ती एकाधिकार की बात मिथ्या सिद्ध हो जाती है।
पुनश्चः नोह (भरतपुर, राजस्थान) तथा इसके दोआब वाले क्षेत्र से लोहा कृष्ण लोहित मृद्भाण्डों (Black and Red Ware) के साथ मिलता है जिसकी संभावित तिथि ई० पू० 1400 के लगभग है।
सुप्रसिद्ध पुराविद् ह्वीलर की मान्यता है कि भारत में सर्वप्रथम लोहे का प्रचलन ईरान के हखामनी शासकों द्वारा किया गया था। इसी प्रकार कुछ अन्य विद्वान यूनानियों को इसे लाने का श्रेय प्रदान करते हैं। किन्तु ये मत समीचीन नहीं लगते।
भारतीय मत:-
पूरियार के दसवें स्तर से भी कृष्णलोहित मृद्भाण्डों के साथ लोहे की एक भाले की नोंक (Spear head) मिलती है। उज्जैन, विदिशा आदि की भी यही स्थिति है।
भगवानपुरा (हरियाणा) में यह चित्रित धूसर मृद्भाण्ड के साथ मिलता है जो उत्तर-हड़प्पाकालीन स्तर है।
आलमगीरपुर तथा रोपड़ में भी यही स्थिति है।
अथर्ववेद में "नील-लोहित" शब्द मिलता है। एक घोष ने स्पष्टतः बताया है कि इससे तात्पर्य 'कृष्ण-लोहित मृद्भाण्ड' से ही है। अतः भारत में लोहे का प्रादुर्भाव कृष्णलोहित मृद्भाण्डों के साथ हुआ न कि चित्रित धूसर मृद्भाण्डों के भगवानपुरा के साक्ष्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लोहा ऋग्वेदिक काल में भी ज्ञात था ।
स्वयं यूनानी साहित्य में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भारतवासियों को सिकन्दर के पहले से ही लोहे का ज्ञान था और यहाँ के कारीगर लौह उपकरणों का निर्माण करने में कुशल थे।
ऋग्वेद भी तीरों तथा भाले की नोकों एवं वर्म (कवच) का उल्लेख करता है। एक स्थल पर कवच तथा शत्रुओं से सुरक्षित लौह दुर्ग बनाने के लिये सोम का आह्वान किया गया है।
'गालव' नामक प्रसिद्ध ऋषि की चर्चा है जिसने पाञ्चाल नरेश दिवोदास को दशराज्ञ युद्ध में लोहे की तलवारें देकर सहायता की थी।
कन्नौज नरेश अष्टक का उल्लेख है जिसने अपने पुत्र का नाम 'लौही' रखा था।
यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम मितन्नियों तथा हित्तियों को लोहे का अविष्कर्त्ता सिद्ध करने के लिये उद्धरण देने में गर्व का अनुभव करते हैं किन्तु अपने साहित्य में उपलब्ध सैकड़ों उद्धरणों की उपेक्षा करते हैं।
हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त उत्तम कोटि के ताँबे तथा कांसे के उपकरण और गंगा घाटी से प्राप्त ताम्रनिधियों एवं गैरिक मृद्भाण्डों से स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन भारतीयों का तकनीकी ज्ञान अत्यन्त विकसित था।
संभव है कि गंगाघाटी के ताम्रधातुकर्मी ही लोहे के अविष्कर्त्ता रहे हों क्योंकि लोहे की दो बड़ी निधियां माण्डी (हिमाचल) तथा नरनौल (पंजाब) उत्तर भारत में ही स्थित हैं।
अफ्रीका के समान भारत में भी ऐसी आदिम जनजातियां (उदाहरण के लिये मध्य प्रदेश की अगरिया) निवास करती थीं। जो देशी तकनीक से लोहा तैयार करती थीं तथा अपने द्वारा निर्मित बर्तनों का व्यापार करती थीं। इन समुदायों को लोहे का ज्ञान नियमित लौह युग के हजारों वर्ष पूर्व ही हो चुका था।
मध्य तथा दक्षिणी भारत में लोहे की बहुलता को देखते हुए यही निष्कर्ष निकलता है कि यहाँ लौह तकनीक तंत्र (Iron Technology) का एक स्वतंत्र आरम्भिक केन्द्र था।
अतः अब यह कहना युक्तिसंगत नहीं है कि भारत में लोहे का आगमन आर्यों के साथ हुआ जबकि उन्होंने लौह तकनीक तंत्र पर हित्ती एकाधिकार को नष्ट कर दिया।
यह बात इस तथ्य से भी पुष्ट होती है कि देश के उत्तरी-पश्चिमी तथा अन्तरिक भागों में लोहा साथ-साथ मिलता है। आद्यवैदिक काल से इस्वी सन् के प्रारम्भ तक लोहे की उपलब्धता के निरन्तर प्रमाण मिलते हैं।
साहित्यक प्रमाण:-
उत्तरवैदिक कालीन साहित्य तो स्पष्टतः लौह धातु के व्यापक प्रचलन का संकेत देता है। सर्वप्रथम उत्तर वैदिक काल (ई० पू० 1000-600) के ग्रन्थों में हमें इस धातु के स्पष्ट संकेत प्राप्त होते हैं।
अथर्ववेद में 'लोहायस' तथा 'श्यामअयस् शब्द मिलते हैं।
वाजसनेयी संहिता में 'लोह' तथा 'श्याम' शब्द मिलते हैं।
'विद्वानों ने 'लोह' शब्द को ताँबे के अर्थ में तथा 'श्याम' शब्द को लोहे के अर्थ में ग्रहण किया है। इस प्रकार अथर्ववेद में उल्लिखित 'श्यामअयस्' से तात्पर्य लौह धातु से ही है। इसके बाद 'अयस' शब्द लोहे का ही पर्याय बन गया।
काठक संहिता में चौबीस बैलों द्वारा खींचे जाने वाले भारी हलों का उल्लेख मिलता है। इनमें अवश्य ही लोहे की फाल लगाई गयी होगी।
अथर्ववेद भी लोहे से बने हुए फाल का उल्लेख करता है। इस प्रकार साहित्यक प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि ईसा पूर्व आठवीं शती में भारतीयों को लोहे का ज्ञान प्राप्त हो चुका था।
पुरातात्विक प्रमाण:-
लोहे की प्राचीनता सम्बन्धी साहित्यिक उल्लेखों की पुष्टि पुरातात्विक प्रमाणों से भी हो जाती है।
अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, मधुरा, रोपड़, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थानों की खुदाईयों से लौह युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
इस काल के लोग एक विशिष्ट प्रकार के बर्तन का प्रयोग करते थे जिसे चित्रित धूसर भाण्ड (Painted Grey-ware) कहा जाता है। इन स्थानों से लोहे के औजार तथा उपकरण, जैसे-भाला, तीर, वसुली, खुरपी, चाकू, कटार आदि मिलते हैं।
अंतरंजीखेड़ा की खुदाई में धातु-शोधन करने वाली भट्ठियों के अवशेष मिले हैं। इन साक्ष्यों से यह विदित होता है कि चित्रित धूसर भाण्डों के प्रयोक्ता लोहे का न केवल ज्ञान रखते थे अपितु इसके विविध उपकरण भी बनाते थे।
पुरातत्वविदों ने इस संस्कृति का समय ईसा पूर्व 1000 के लगभग निर्धारित किया है।
पूर्वी भारत में सोनपुर, चिरांद आदि स्थानों की खुदाइयों से लोहे की वर्धियां, छेनी, कीले आदि मिली हैं जिनका समय आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है।
इसी प्रकार मध्य भारत के एरण, नागदा, उज्जैन, कायथा आदि स्थानों की खुदाईयों से भी लौह उपकरण मिलते हैं। इनका समय भी ईसा पूर्व सातवीं-छठीं शती निर्धारित किया जाता है।
दक्षिणी भारत के विभिन्न स्थानों से बृहत्पाषाणिक कब्रें (Megaliths ) प्राप्त होती हैं। इनकी खुदाईयों में लोहे के औजार-हथियार तथा उपकरण प्रचुरता से मिलते हैं। इस संस्कृति के लोग काले तथा लाल रंग के वर्तनों का प्रयोग करते थे। विद्वानों ने इस संस्कृति का समय ईसा पूर्व एक हजार से लेकर पहली शताब्दी ईस्वी तक निर्धारित किया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दक्षिणी भारत के लोगों को लोहे का ज्ञान ईसा पूर्व एक हजार में हो गया था।
निष्कर्ष:-
उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत के विभिन्न भागों में लोहे का प्रचलन ईसा पूर्व एक हजार के लगभग हो गया था।
कुछ विद्वानों की धारणा है कि सर्वप्रथम दक्षिण भारत में इसका प्रचार हुआ तथा वहाँ लौह-संस्कृति का प्रारम्भ पाषाण काल के तुरन्त बाद हो गया। इसके विपरीत उत्तरी भारत में पाषाण काल के बाद पहले ताम्र फिर कांस्य काल आया। इसके कई सौ वर्षों बाद लौहे का आविष्कार किया गया।
लोहे के ज्ञान से लोगों के भौतिक जीवन में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन उत्पन्न हो गया।
बुद्ध काल तक आते-आते पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार में इसका व्यापक रूप से प्रयोग किया जाने लगा।
लौह तकनीक के फलस्वरुप कृषि उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि हो गयी।
इस समय गंगा घाटी में नगरीय क्रान्ति आई तथा बड़े-बड़े नगरों की स्थापना हुई। विद्वानों ने इसके पीछे लौह तकनीक को ही उत्तरदायी ठहराया है।
मगध साम्राज्य के उत्कर्ष के पीछे भी इसी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
इस प्रकार विविध साक्ष्यों पर विचार करने के उपरान्त लोहे के भारतीय उत्पत्ति का सिद्धान्त अधिक तर्कसंगत लगता है तथा इसकी प्राचीनता ऋग्वैदिक काल तक ले जायी जा सकती है। किन्तु वास्तविक लौह युग का प्रारम्भ उस समय से हुआ जबकि 'मनुष्य ने इस धातु का प्रयोग जंगलों की कटाई कर भूमि को कृषि योग बनाने तथा बस्तियां बसाने के लिये करना प्रारम्भ कर दिया।
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