स्मारक एवं भवन
स्मारक और भवनों से जनता की आध्यात्मिकता तथा
धर्मनिष्ठा का ज्ञान होता है।
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त
भवनों से 5,500 वर्ष पुरानी सैंधव सभ्यता
का पता चला है। (नवीन शोध के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता लगभग 8,000 साल पुरानी है। )
अतरंजीखेड़ा (उ. प्र.) आदि
की खुदाईयों से पता चलता है कि ई. पू. ईसा पूर्व 1000 के लगभग देश में लोहे का प्रयोग प्रारंभ हो
गया था।
प्राचीन काल में भारत में भारी संख्या में
मंदिरों का निर्माण हुआ, जिनके अवशेष बिखरे रूप
में पूरे देश में हैं।
महलों और मंदिरों की शैली से वास्तुकला के विकास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।
विभिन्न स्थानों से प्राप्त मंदिर:-
- देवगढ़ का दशावतार मंदिर (झाँसी)
- भीतरगाँव का मंदिर (कानपुर)
सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की ताम्रमूर्ति आदि।
इससे हिंदू कला एवं सभ्यता के पर्याप्त विकसित होने के प्रमाण मिलते हैं।
भारत में मंदिरों की शैली:-
- उत्तर भारत के मंदिर 'नागर शैली'
- मध्य भारत के मंदिर 'बेसर शैली'
- दक्षिण भारत के मंदिर 'द्रविड़ शैली'
दक्षिण भारत में तंजौर
का राजराजेश्वर मंदिर द्रविड़ शैली तथा
उत्तर भारत में खजुराहो का कन्दरिया महादेव का मंदिर
नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
भारत के अति दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक
द्वीपों से हिंदू संस्कृति से संबंधित स्मारक मिलते हैं। इनमें मुख्य रूप से जावा का बोरोबुदुर स्तूप (महायान बौद्ध स्तूप) तथा कम्बोडिया के
अंकोरवाट मंदिर का उल्लेख किया जा सकता है।
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