वैदिक कालीन सभ्यता अथवा आर्य सभ्यता
वैदिक कालीन सभ्यता
सैन्धव संस्कृति के पश्चात् भारत में जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ उसे वैदिक अथवा आर्य सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
भारत का इतिहास एक प्रकार से आर्य जाति का इतिहास है।
आयों का इतिहास हमें मुख्यतः वेदों से ज्ञात होता है जिसमें ऋग्वेद सर्वप्राचीन होने के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
सामान्यतः ऐसा माना गया है कि जिन विदेशी आक्रान्ताओं ने सैंधव नगरों को ध्वस्त किया था, वे आर्य' ही थे।
स्वयं ऋग्वेद में इस संघर्ष का अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख मिलता है।
ऋग्वेद में इन्द्र को दास-दस्युओं का विनाश करने वाला (दस्युहन्) कहा गया है।
इस ग्रन्थ में दास-दस्युओं के पुरों का भी वर्णन आया है जिनको विनष्ट करने के कारण इन्द्र को 'पुरन्दर' कहा गया है।
ये पुर चौड़े (उर्वी), पाषाण-निर्मित (अश्ममयी), धातुनिर्मित (आयसी), कच्ची ईटों के बने हुए (आमा) और 100 दीवारों वाले (शतभुजी) आदि कहे गये हैं।
ये पुर सैंधव नगरों से भिन्न नहीं थे।
दास-दस्युओं की जो विशेषतायें ऋग्वेद में वर्णित हैं वे सब सैन्धव निवासियों में देखी जा सकती हैं। संभवतः हड़प्पा में दास-दस्यु अधिक संख्या में थे।
ऋग्वेद में दास-दस्युओं को 'अकर्मन्' (वैदिक क्रियाओं को न करने वाले), 'अदेवयुः' (वैदिक देवताओं को न मानने वाले), 'अयज्वन' (यज्ञ न करने वाले), 'अन्यव्रत' (वैदिकेतर व्रतों का अनुसरण करने वाले), 'मृद्धवाक्' (अपरिचित भाषा बोलने वाले), 'अब्रह्मन्' (श्रद्धा और धार्मिक विश्वास से रहित) एवं 'अव्रत' (व्रतों से रहित) कहा गया है। दास-दस्युओं को लिङ्गपूजक (शिश्न देवाः) कहा गया है।
दास-दस्युओं की संस्कृति के इन वैदिक उल्लेखों में कोई भी बात ऐसी नहीं है जो सैंधव सभ्यता के लोगों पर लागू न होती हो। यह एक महत्वपूर्ण बात है कि सैंधव निवासियों के धार्मिक आचार में लिंग पूजा को विशेष स्थान प्राप्त था और उनकी भाषा, जो अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है, वैदिक संस्कृत से भिन्न थी।
इस आधार पर कुछ विद्वान यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सैंधव नगरों का विनाश अन्ततोगत्वा आर्यों के आक्रमण से ही संभव हुआ था ।
किन्तु अब आर्य आक्रमण का सिद्धान्त खोखला सिद्ध हो चुका है।
'शिश्न देवाः' का अर्थ भाष्यकार सायण भिन्न प्रकार से करते हुए कामाशक्त अथवा विलासी (शिश्नेन दिव्यन्ति क्रीडन्ति वा) के अर्थ में प्रयुक्त कहते हैं।
के. सी. चट्टोपाध्याय का विचार है कि ऋग्वेद में वर्णित दास-दस्य संघर्ष पौराणिक देवासुर संग्राम का ही रूपान्तर है न कि मानव जातियों के संघर्ष का ।
इस प्रकार वैदिक-सैन्धव सभ्यता में विभेद सूचक बातें अधिकांशतः कल्पना पर ही आधारित हैं, वास्तविकता पर नहीं।
मूल निवास स्थान:-
परन्तु सैंधव सभ्यता के विनाशक आर्य किस प्रदेश के निवासी थे, यह एक अत्यन्त विवादग्रस्त प्रश्न है। यहाँ कुछ प्रमुख मतों का संक्षेप में उल्लेख किया जावेगा। भारत अनेक विद्वानों की धारणा है कि आर्य मूलतः भारत के ही निवासी थे तथा यहीं से वे विश्व के विभिन्न भागों में गये।
पं० गंगानाथ झा ब्रह्मर्षि देश, डी० एस० त्रिवेद मुल्तान स्थित देविका, एल० डी० कल्ल कश्मीर तथा हिमालय क्षेत्र में ओयों का मूल निवास स्थान बताते है। किन्तु हमें अब यह तो मान ही लेना चाहिए कि भारत आर्यों का मूल निवास स्थान नहीं था और वे यहाँ आक्रान्ता के रूप में ही आये थे।
सैंधव सभ्यता आर्य सभ्यता से भिन्न एवं इससे अधिक प्राचीन थी। यदि आर्य भारत के निवासी होते तो वे सर्वप्रथम अपने देश का ही आर्यीकरण करते। समस्त दक्षिणी भारत आज तक आर्यभाषा-भाषी नहीं है। उत्तर-पश्चिम में बलूचिस्तान से 'ब्राहुई' भाषा का पता चलता है जो द्रविड़ परिवार की भाषा थी। यह इस बात का सूचक है कि सम्पूर्ण भारत अथवा कम से कम उसका एक बड़ा भाग भाषा की दृष्टि से अनार्य था। यह आर्यों के भारतीय मूल के सिद्धान्त के विरुद्ध सबसे प्रबल प्रमाण है।
भिन्न-भिन्न विद्वानों ने आर्यों का मूल स्थान विश्व के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में निर्धारित करने का प्रयास किया है।
उत्तरी ध्रुव:-
आयों का आदि स्थान उत्तरी ध्रुव में मानने वाले सर्वप्रथम विद्वान पं० बाल गंगाधर तिलक हैं। तिलक महोदय का विचार है कि आर्यों में ऋग्वेद की रचना सप्त सैन्धव प्रदेश में किया था। इसमें एक सूक्त के अन्तर्गत दीर्घकालीन उषा की स्तुति मिलती है। दीर्घकालीन उषा उत्तरी ध्रुव में ही दिखाई देती है। महाभारत में सुमेरुपर्वत का वर्णन मिलता है जहाँ छः महीने का दिन तथा छः महीने की रात होती है। यहाँ भी उत्तरी ध्रुव की ओर ही संकेत है। अतः हम कह सकते हैं कि आर्य उत्तरी ध्रुव के ही निवासी थे और इसी कारण उनके मस्तिष्क में अपनी मूल भूमि की स्मृति बनी हुई थी।
किन्तु तिलक का उपर्युक्त मत कोरे साहित्य पर आधारित होने के कारण मान्य नहीं हैं। स्वयं आर्यों ने ही सप्त सैन्धव प्रदेश को 'देवताओं द्वारा निर्मित' (देवकृत योनि) कहा है। यदि उत्तरी ध्रुव उनका आदि देश होता तो कहीं न कहीं स्पष्ट रूप से उसका उल्लेख वे करते ।
एशिया:-
अनेक विद्वानों ने एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में आर्यों का मूल निवास स्थान स्वीकार किया है। मैक्समूलर महोदय आर्यों का आदि देश मध्य एशिया, रोड्स बैक्ट्रिया तथा एडवर्ड मेयर पामीर के पठार को मानते हैं। मेयर महोदय का विचार है कि पामीर के पठार से ही इण्डो-ईरानी जाति पूर्व में पंजाब तथा पश्चिम में मेसोपोटामिया की ओर गयी। इस मत का समर्थन ओल्डेनवर्ग तथा कीथ आदि विद्वानों ने भी किया है।
ब्रेन्डेस्टीन महोदय ने बताया है कि भारतीय भाषाकोश से प्रकट होता है कि आर्य मूलतः एक पर्वत के नीचे घास के मैदान में निवास करते थे। यह मैदान यूराल पर्वत के दक्षिण में स्थिर किर्जिंग का मैदान था ।
जो विद्वान् एशिया को आर्यों का मूल स्थान स्वीकार नहीं करते, उनका कहना है कि भारोपीय भाषा-भाषी परिवार के मुहावरों का प्रसार यह सिद्ध करता है कि आर्यों का मूल निवास स्थान एशिया की अपेक्षा यूरोप में खोजना अधिक तर्कसंगत होगा।
यूरोप:-
यूरोप महाद्वीप के विभिन्न स्थानों- जर्मनी, हंगरी तथा दक्षिणी रूस में विद्वानों ने आर्यों का मूल स्थान निर्धारित करने के पक्ष में अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किये हैं। इनका विवरण इस प्रकार है-
जर्मनी:-
जर्मनी को आर्यों का आदि देश मानने वाले विद्वानों में पेनका, हर्ट (Hirt) आदि प्रमुख हैं। उनके तर्क इस प्रकार है-
(1) मध्य जर्मनी में स्थित स्कैन्डेनीविया नामक स्थान कभी भी विदेशी आधिपत्य में नहीं रहा तो भी यहाँ के निवासी भोरोपीय भाषा बोलते थे। इससे सिद्ध होती है कि भारोपीय भाषा का मूल स्थान यहीं था ।
(2) पश्चिम बाल्टिक सागर के तट से सर्वप्राचीन एवं अति साधारण वस्तुऐं पाई गयी हैं। यहाँ से प्राप्त पाषाणोपकरण अत्यन्त कलापूर्ण एवं तकनीकी दृष्टि से उत्तम कोटि के हैं। ये सब भारोपीयों की कृतियाँ हैं। मध्य जर्मनी से भी प्रागैतिहासिक काल के कुछ मृद्भाण्ड पाये गये हैं। इन्हें भी प्राचीन आर्यों से ही सम्बन्धित किया गया है।
(3) आर्यों की शारीरिक विशेषतायें भी उन्हें जर्मनी का आदिवासी बताती हैं। जैसे उनकी एक प्रमुख विशेषता भूरे बालों का होना है। आज भी जर्मनी के लोग भूरे बालों वाले पाये जाते हैं।
परन्तु यदि उपर्युक्त तर्कों की आलोचनात्मक समीक्षा की जाय तो बड़ी आसानी से उनका खण्डन हो जायेगा। एकमात्र भाषाई आधार पर स्कैन्डेनीविया को आर्यों का मूल स्थान नहीं माना जा सकता। किसी स्थान की भाषा का परिवर्तित न होना उसके वोलने वालों की प्रगतिहीनता तथा संकीर्णता को भी सूचित करता है न कि उसकी प्राचीनता को ।
वाल्टिक सागर तथा मध्य जर्मनी से मिलते-जुलते उपकरण तथा मृद्भाण्ड कुछ अन्य स्थानों जैसे दक्षिणी रूस, पोलैण्ड, त्रिपोल्जे आदि से भी मिलते हैं। कुछ उपकरण जर्मनी के उपकरणों से भी अधिक प्राचीन हैं।
जहाँ तक भूरे बालों प्रश्न है यह एक मात्र जर्मनी के निवासियों की ही विशेषता नहीं है। पतंजलि ने भारतीय ब्राह्मणों को भी भूरे बालों वाल बताया है, तो क्या हम केवल इसी आधार पर भारत को आर्यों का आदि देश स्वीकार कर सकते हैं।
हंगरी:-
आर्यों का मूल निवास स्थान हंगरी अथवा डेन्यूब नदी घाटी के मानने वाले विद्वानों में गाइल्स सर्वप्रमुख है। विभिन्न भारोपीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद उन्होने यह बताया है कि आर्य मूलतः एक ऐसे स्थान में रहते थे जहाँ पर्वत, नदियाँ, झील आदि थे तथा गेहूँ, जो की प्रमुख रूप से खेती की जाती थी और गाय, बैल, भैड़, घोड़ा, कुत्ता आदि पशु पाले जाते थे। ये सभी विशेषतायें हंगरी प्रदेश अथवा डेन्यूब नदी घाटी में प्राप्त होती हैं। यहीं आर्यों का मूल निवास स्थान रहा होगा।
किन्तु यह मत भी असंगत है। इस प्रकार की विशेषतायें कुछ अन्य स्थानों में भी पाई जाती हैं। मात्र भाषाविज्ञान आधार पर इस समस्या का हल निकालना उचित नहीं लगता।
दक्षिणी रूस -
कतिपय पुरातत्वीय एवं भाषाशास्त्रीय सामग्रियों के आधार पर शेयर, पीक तथा गार्डन चाइल्ड्स दक्षिणी रूस को आर्यों का मूल निवास स्थान स्वीकार किया है।
दक्षिणी रूस में किये गये उत्खनन से लगभग उसी प्रकार की संस्कृति के अवशेष मिले हैं जो आर्यों के समय में थे। यहाँ की खुदाई से अश्व का अवशेष भी मिला है आर्यों का प्रिय पशु था। पिगट महोदय के अनुसार आर्य दक्षिणी रूस के एक विस्तृत प्रदेश पर निवास करते थे। दक्षिण रूस के त्रिपोल्जे से लगभग तीस हजार ईसा पूर्व के मुद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं। इस आधार पर नेहरिंग ने दक्षिणी रूस को आर्यों का आदि-देश बताया है। भारोपीय तथा मध्य रूस की फिनो उग्रीयन (Finno-Ugrian) भाषाओं में आश्चर्यजनक समता दिखाई देती है जो इस बात की सूचक है कि भारोपीय तथा मध्य रूस की जाति में प्राचीन काल से ही ऐतिहासिक सम्पर्क था। अतः उक्त विद्वानों के अनुसार दक्षिणी रूस को आर्यों का मूल निवास स्थान स्वीकार किया ज सकता है।
इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि आर्यों को विदेशी मूल का मानने का मत प्रधानतया भाषा विज्ञान पर आधारित होने के कारण बहुत अधिक सबल नहीं है। वेद में कोई उद्धरण ऐसा नहीं है जो यह सिद्ध कर सके कि आर्य यहाँ आक्रान्ता के। रूप में आये थे।
'आर्य' शब्द को जातिवाची मानना ठीक नहीं है। ऋग्वेद के मंत्रों में प्रयुक्त शब्दों की संख्या 153972 है जिसमें 'आर्य' शब्द मात्र 33 बार ही आता है। भाषाविदों ने तुलनात्मक भाषा विज्ञान को एक प्रामाणिक शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया है किन्तु भाषा एक सांस्कृतिक इकाई है जिसका किसी जाति विशेष से संबंध स्थापित करना उचित नही है। एक ही प्रजाति के लोग विभिन्न भाषा-भाषी हो सकते हैं।
ऋग्वेद में आर्य तथा दास-दस्यु के बीच जो विभेद किया गया है वह प्रजातीय न होकर धार्मिक लगता है। आर्य तथा दास-दस्यु किसी जन समुदाय, प्रजाति अथवा जनजाति के नाम नहीं लगते। इनका विरोध धार्मिक व अधार्मिक का विरोध है। दास-दस्यु का प्रयोग परिचारक के रूप में भी मिलता। है। 'दस्यु' शब्द ईरानी भाषा में भी मिलता है जो ग्रामीण जन का सूचक है।
जहाँ तक 'ब्राहुई' भाषा का प्रश्न है इसका दक्षिण की द्रविड़ भाषा से दूर का संबंध ही हो सकता है। उत्तर-पश्चिम में इसके व्यापक प्रचलन का प्रमाण नहीं मिलता। कुछ विद्वानों का कहना है कि बलूचिस्तान में ब्राहुई भाषा-भाषी लोग बाहर से आये थे जबकि कुछ विद्वान् इस भाषा को बोलचाल की आधुनिक पूर्वी एलमी (Modern Eastern Colloquial Elamite) भाषा बताते हैं।
यह भी दृष्टव्य है कि गोदावरी के दक्षिण में सैन्धव सभ्यता का कोई साक्ष्य नहीं मिलता। जहाँ तक इन्द्र को 'पुरन्दर' अर्थात् पुरों को ध्वस्त करने वाला कहे जाने का प्रश्न है, इस संबंध में उल्लेखनीय हैं कि कोटदीजी तथा कालीबंगन के प्राक-सैन्धव स्थलों से भी दुर्गीकरण के साक्ष्य मिल चुके हैं। स्वयं सिन्धु सभ्यता के लोगों द्वारा पूर्ववर्ती संस्कृति के दुर्गों का भेदन किया जाना भी संभव है। ऐसी स्थिति में अब केवल आयों के ही देवता को 'पुरन्दर' नहीं कहा जा सकता।
पुनश्च इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि इन्द्र शत्रु नगरों का विजेता था। पुरातत्व से भी आर्यों के आक्रान्ता होने की बात पुष्ट नहीं होती। अब प्रायः सभी विद्वान् इसे स्वीकार करने लगे है कि इस बात का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि आप विदेशी आक्रान्ता थे।
जो विद्वान् आर्यो को विदेशी मूल का मानते हैं उनका आधार मैक्समूलर द्वारा निर्धारित ऋग्वेद की तिथि है। सूत्र साहित्य को ई० पू० 600-200 में रखते हुए वे इसके पूर्ववर्ती साहित्य जिसका विभाजन वे ब्राह्मण काल, मन्त्रकाल, तथा छन्दकाल में करते हैं, के लिये दो-दो सौ वर्षों की अवधि निर्धारित करते हुए प्रस्तावित करते हैं कि वैदिक मन्त्रों को रचना लगभग 1200 ई० पू० में हुई। यह निष्कर्ष उस समय तक ठीक था जब तक पश्चिम के लोगों को वैदिक साहित्य के विषय में बहुत कम ज्ञात था । परन्तु अब यह मत अमान्य हो गया है। स्वयं मैक्समूलर ने भी अपने जीवन के अन्तिम "दिनों में इसे त्याग दिया था। पुनश्च मैक्समूलर द्वारा निर्धारित तिथिक्रम की विधि संदिग्ध है और इसे सत्य नहीं माना जा सकता।
वैदिक काल को दो भागों में विभाजित किया जाता है:-
- ऋग्वैदिक अथवा पूर्ववैदिक काल (Early Vedic Period)
- उत्तर वैदिक काल (Later Vedic Period)

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