लोथल (Lothal)
लोथल (Lothal)
लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले के ढोलका तालुका में सरगवाला गांव के राजस्व क्षेत्र में स्थित प्राचीन टीले का नाम है। यह साबरमती की सहायक भोगवा नदी के किनारे स्थित हैं। कहा जाता है कि गुजराती में 'लोथल' शब्द का अर्थ 'मृतकों का स्थान' होता है, जो लोथ और थाल (स्थल) शब्दों को मिलाकर बनाया गया है।
1952 में, पुरातत्वविद् एस.आर. राव ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नव स्वतंत्र भारत में लोथल, कालीबंगन, धोलावीरा और राखीगढ़ी स्थलों की खोज की।
1955 से 1962 के बीच एस. आर. राव के निर्देशन में खुदाई हुई। 2 मिल के घेरे में नगर की प्राप्ति हुई।
चतुष्कोणीय किलेबंद लेआउट के भीतर, लोथल के दो क्षेत्र हैं - ऊपरी(दुर्ग या गढ़ी) और निचला नगर।
सम्पूर्ण बस्ती एक ही प्राचीर से घिरी है।
प्राचीर के भीतर कच्ची ईंटों से बने चबूतरों पर घर बनाये गये थे। घरों के निर्माण में प्रायः कच्ची ईंटों का प्रयोग किया गया था। कुछ विशिष्ट भवन ही पक्की ईंटों के बने थे। नालियों तथा स्नानागृह की फर्शो के निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया था।
दुर्ग के पश्चिम में ऊँचे चबूतरे पर 126x30 मीटर के आकार का एक भवन मिला है जिसमें स्नानगृह और नालियाँ बने थे। इसे 'शासक का आवास' बताया गया है। दुर्ग के ही समीप बने अन्नागार का अवशेष मिलता है।
कुछ घरों से पशुओं की हड्डियाँ, ताँबा, कांचली मिट्टी के मनके, सोने का एक आभूषण, जली हुई कुछ हड्डियाँ, वृत्ताकार या चतुर्भुजाकार अग्निवेदियाँ आदि पाई गयी हैं।
निचला नगर दुर्ग वाले क्षेत्र से तिगुना विस्तृत था। यह कच्ची ईंटों के चबूतरे पर बना था। यह चार खण्डों में विभाजित था। खुदाई में चार सड़कों के अस्तित्व का पता चला है। नगर के उत्तर में बाजार, पश्चिम में व्यावसायिक भवन तथा उत्तर में भवनों के अवशेष मिलते हैं। बाजार में शंख तथा तांबे का काम करने वाले कारीगरों के कारखाने स्थित थे। यहाँ से फारस की खाड़ी प्रकार (Persian Gulf Style) की एक मुहर मिली है। एक दिशा मापक यंत्र, पैमाना तथा साहुल के भी अवशेष मिलते हैं। यहाँ की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि पकी ईटों का बना हुआ विशाल आकार (214 × 36 मीटर) का एक घेरा है जिसे राव महोदय ने 'जहाजों की गोदी' (Dock-Yard) बताया है। इसकी उत्तरी दीवार में 12 मीटर चौड़ा प्रवेश द्वार था जिससे होकर जहाज आते-जाते थे। यह नहर द्वारा भोगावा नदी से जोड़ा गया था तथा इसी के जरिये गोदी में पानी आता था। दक्षिणी दीवार में एक मीटर चौड़ी एक नाली बनाई गयी थी जिससे अतिरिक्त पानी बाहर निकाला जाता था। गोदीवाड़ा की प्राप्ति से इस नगर के प्रसिद्ध बन्दरगाह होने का पता लगता है। यह विश्व का प्राचीनतम ज्ञात गोदीबाड़ा है। इसी से सटा हुआ एक गोदाम था जहाँ आने-जाने वाला माल अस्थाई तौर पर रखा जाता था। दोनों के बीच दुर्ग स्थित था जहाँ रहने वाले लोग संभवतः यहाँ की गतिविधियों पर निगरानी रखते होंगे। यहाँ मिस्र तथा मेसोपोटामिया से व्यापारिक जहाज आते-जाते थे। यह नगर मोहेनजोदड़ों के साथ घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित था।
लोथल की नगर एवं भवन योजना सुनियोजित एवं सुव्यवस्थित थी। नालियों एवं नरमोखों की अत्युत्तम प्रबन्ध देखने को मिलता है जो यहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य तथा सफाई के प्रति सजगता का प्रमाण है। ये सभी विशेषतायें हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में प्राप्त होती हैं। इसी कारण लोथल के उत्खननकर्त्ता एस0 आर0 राव ने इस स्थल को लघु हड़प्पा या लघु मोहेनजोदड़ो कहना पसन्द किया है।
आधार के उत्तरी और दक्षिणी छोर पर एक इनलेट और एक आउटलेट की पहचान की गई है जो नौकायन की सुविधा के लिए पर्याप्त जल स्तर बनाए रखने में सहायता करेगा। संभवतः फारस की खाड़ी से संबंधित पत्थर के लंगर, समुद्री गोले और सील इस बेसिन के उपयोग को एक गोदी के रूप में पुष्ट करते हैं जहां उच्च ज्वार के दौरान नावें कैम्बे की खाड़ी से ऊपर की ओर रवाना होती थीं।
संग्रहालय की स्थापना 1952 से 1961 तक की गई खुदाई से प्राप्त कलाकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए 1976 में की गई थी। संग्रहालय में तीन दीर्घाएँ हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने लोथल में राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर (एनएमएचसी) स्थल के निर्माण की समीक्षा की है।
निया का पहला ज्ञात ड्राई डॉक

Comments
Post a Comment