लौहयुगीन संस्कृतियां
लौहयुगीन संस्कृतियां
चित्रित धूसर मृद्भाण्ड ⏭ ⏭⏭ ताम्र ⏭⏭ कांस्य ⏭⏭ लौहा
चित्रित धूसर मृद्भाण्ड, ताम्र तथा कांस्य के प्रयोग के पश्चात् मनुष्य ने लौह धातु का ज्ञान प्राप्त कर इसका प्रयोग अस्त्र-शस्त्र एवं कृषि उपकरणों के निर्माण में किया।
इसके फलस्वरूप मानव जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ।
उत्खनन के परिणामस्वरूप भारत के उत्तरी, पूर्वी, मध्य तथा दक्षिणी भागों के लगभग 700 से भी अधिक पुरास्थलों से लौह उपकरणों के प्रयोग के साक्ष्य प्रकाश में आये हैं।
उत्तर भारत के प्रमुख स्थल:- अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, अहिच्छत्र, अल्लाहपुर (मेरठ), खलौआ, नोह, रोपड़, वटेश्वर, हस्तिनापुर, श्रावस्ती, कम्पिल, जखेड़ा आदि हैं।
इनमें हस्तिनापुर के उत्खनन की सामग्री ही विधिवत् प्रकाशित की गयी है। इन स्थलों की प्रमुख पात्र परम्परा चित्रित धूसर मृदुभाण्ड (Painted Grey Ware) है। इसके साथ लोहे के विविध उपकरण जैसे भाले, बाणाग्र, कुल्हाड़ी, कुदाल, दरौती, चाकू, फलक, कीलें, पिन, चिमटा, वसूला आदि मिले हैं। हस्तिनापुर तथा अतरंजीखेड़ा से धातुमल (Iron slag) मिलता है जिससे सूचित होता है कि धातु को गलाकर ढलाई की जाती थी।
चित्रित धूसर पात्र परम्परा की तिथि रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर ईसा पूर्व आठवीं-नवीं निर्धारित की गयी है।
नोह तथा इसके दोआब क्षेत्र से काले और लाल मृद्भाण्ड (Black and Red Ware) के साथ लोहा प्राप्त हुआ है जिसकी संभावित तिथि ईसा पूर्व 1400 के लगभग है।
भगवानपुरा, माण्डा, दघेरी, आलमगीरपुर, रोपड़ आदि में चित्रित धूसर भाण्ड, जिसका संबंध लोहे से माना जाता है, सैन्धव सभ्यता के पतन के तत्काल बाद (लगभग 1700 ई० पू०) मिल जाते हैं।
पूर्वी भारत के प्रमुख लौहकालीन स्थल:-पाण्डुराजार ढिवि, महिषदाल, सोनपुर, चिरान्ड आदि।
यहाँ लौह उपकरण काले और लाल मृद्भाण्डों के साथ मिले हैं। इ
नमें बाणाग्र, छेनियां, कीलें आदि हैं।
महिषदाल से धातुमल तथा भट्टियां मिलती हैं जिनसे सूचित होता है कि धातु को स्थानीय रूप से गला कर उपकरण तैयार किये जाते थे। रेडियो कार्बन तिथियों के आधार पर यहाँ लोहे का प्रारम्भ ईसा पूर्व 750-700 निर्धारित किया गया है।
दक्षिणी-पूर्वी उत्तर प्रदेश के विविध स्थलों:— झुंसी (इलाहावाद), राजा नल का टीला (सोनभद्र), मल्हार (चन्दौली) आदि से प्राप्त पुरानिधियों के आधार पर लोहे की प्राचीनता ई० पू० 1500 तक जाती है।
मध्य भारत (मालवा) तथा राजस्थान:-
मध्य भारत के प्रमुख पुरास्थल एरण तथा नागदा हैं।
यहाँ से लौह निर्मित दुधारी कटारें, कुल्हाड़ी, वाणाग्र, हंसिया, चाकू आदि मिलते हैं।
एरण तथा नागदा की प्रारम्भिक संस्कृति ताम्रपाषाणिक है जिसमें बाद में लोहा जुड़ गया।
प्रारम्भ में ऐसा माना जाता था कि एरण तथा नागदा में ताम्रपाषाणिक संस्कृति के तत्काल बाद ऐतिहासिक युग प्रारम्भ हो गया (लगभग 700-600 ईसा पूर्व) तथा इसी में लोहे का प्रयोग होने लगा। किन्तु अब यह स्पष्ट होता है कि दोनों के बीच कुछ व्यवधान था। इसी व्यवधान काल में लोहे का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। एन० आर० बनर्जी ने इसकी तिथि ईसा पूर्व 800 निर्धारित की है।
एरण में लौहकालीन स्तर की तीन रडियो कार्बन तिथियाँ निर्धारित की गयी हैं:-
- ईसा पूर्व 140 + 110 (TF-326)
- ईसा पूर्व 1270 + 110 (TF-324)
- ईसा पूर्व 1239 + 79 (TF-525)
डी० के० चक्रवर्ती इसकी तिथि ई० पू० 1100 निर्धारित करते हैं। उल्लेखनीय है कि इसी के समीपवर्ती राजस्थान के अहाड़ नामक पुरास्थल से लोहा तथा धातुमल प्रथम काल खण्ड के दूसरे स्तर के पाँच निक्षेपों से मिलता है जिसकी संभावित तिथि ईसा पूर्व 1500 के लगभग निश्चित की गयी है।
दक्षिण भारत:- आन्ध्र, कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु के विविध पुरास्थलों से वृहत् अथवा महापाषाणिक (मेगालिथिक) संस्कृतियों के साक्ष्य मिलते हैं।
ब्रह्मगिरि, मास्की, पुदुकोट्टै, चिंगलपुत्त, शानूर, हल्लूर आदि महत्वपूर्ण स्थल हैं।
इन स्थलों से प्राप्त महापाषाणिक समाधियों से बड़ी संख्या में लौह उपकरण जैसे- तलवार, कटार, त्रिशूल, चिपटी कुल्हाड़ियाँ, फावड़े, छेनी, वसूली, हंसिया, चाकू, भाले आदि लगभग तैंतीस प्रकार के उपकरण काले तथा लाल रंग के मृदभाण्डों के साथ मिले हैं।
हल्लूर नवपाषाण एवं महापाषाण के बीच एक संक्रान्ति काल की सूचना देता है। विभिन्न पुरास्थलों से प्राप्त उपकरणों को भिन्न-भिन्न तिथिक्रमों में रखा गया है। ह्वीलर इस संस्कृति की प्राचीनतम तिथि ईसा पूर्व तीसरी दूसरी शती निर्धारित करते हैं किन्तु आधुनिक शोधों से जो प्रमाण उपलब्ध हुए हैं, उनके आधार पर दक्षिण में लौह उपकरणों के प्रयोग की प्राचीनता काफी पीछे तक जाती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि दक्षिण में लोहे का प्रयोग सहस्त्राब्दि ईसा पूर्व में प्रारम्भ हो गया था। हल्लूर उपकरणों की रेडियो कार्बन तिथि ईसा पूर्व 1000 के लगभग निर्धारित की गयी है।
भारत में लोहे की प्राचीनता के विषय में विवाद है। पहले ऐसा माना जाता था कि मध्य एशिया की हित्ती जाति (ई) पू0 1800-1200) का इस पर एकाधिकार था और सर्वप्रथम उसी ने इसका प्रयोग किया। किन्तु अब इस सम्बन्ध में नवीन साक्ष्यों के मिल जाने के बाद यह मत मान्य नहीं है। नोह (राजस्थान) तथा इसके दोआब क्षेत्र से लोहा काले और लाल मृदभाण्डों (Black and Red Wares) के साथ मिलता है जिसकी सम्भावित तिथि ई० पू० 1400 है। कुछ स्थलों जैसे भगवानपुरा, माण्डा, दधेरी, आलमगीपुर, रोपड़ आदि में चित्रित धूसर भाण्ड सैन्धव सभ्यता के पतन के साथ (लगभग ई० पू० 1700) मिलते हैं जिनका सम्बन्ध लोहे से माना गया है।
ऋग्वेद में कवच (वर्म) का उल्लेख है जो अवश्य ही लोहे के रहे होंगे। अधिकांश विद्वान् यह मानने लगे हैं कि ऋग्वैदिक आर्यों को भी इसका ज्ञान था।
हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त उत्तम कोटि के ताँबे और कांसे के उपकरण तथा गंगाघाटी से प्राप्त ताम्र निधियों एवं गेरिक भाण्डों से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन भारतीयों का तकनीकी ज्ञान अत्यन्त विकसित था । सम्भव है गंगाघाटी के ताम्र धातुकर्मी ही लोहे के आविष्कर्ता रहे होंगे क्योंकि कच्चे लोहे की दो बड़ी निधियाँ माण्डी (हिमाचल) तथा नरनौल (पंजाब) उत्तर भारत से ही मिलती हैं। भारत के विभिन्न स्थलों की खुदाई से लौह प्रयोक्ता संस्कृतियों के साक्ष्य मिलते हैं। ये अत्यन्त समृद्ध एवं विकसित ग्राम्य संस्कृतियाँ हैं जिनकी पृष्ठभूमि पर ऐतिहासिक काल में द्वितीय नगरीकरण सम्भव हुआ। इन संस्कृतियों के लोग जिस विशिष्ट प्रकार के मृद्भाण्ड का प्रयोग करते थे वे प्रधानतः धूसर या स्लेटी (Grey) रंग के हैं और इनके ऊपर काले रंग में चित्रकारियाँ की गयी हैं। इन्हें चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (Painted Grey Ware-P.G.W.) कहा जाता है। प्रारम्भिक पात्रों के सात लौह उपकरण नहीं मिलते किन्तु बाद में ये सभी स्थलों से मिलते हैं। इस कारण चित्रित धूसर भाण्ड संस्कृति लौहकालीन संस्कृति कही जाती है।
मध्यदेश अथवा ऊपरी गंगाघाटी क्षेत्र में :-
यद्यपि लौहयुगीन संस्कृति के अधिकांश स्थल मध्यदेश अथवा ऊपरी गंगाघाटी क्षेत्र में स्थित हैं जो सतलज से गंगा नदी तक विस्तृत था, किन्तु इसका विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी मिलता है।
प्रमुख स्थल जिनकी खुदाई की गयी है- अहिच्छत्र, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, अल्लाहपुर (मेरठ), मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, नोंह, काम्पिल्य आदि (उत्तरी भारत), नागदा तथा एरण (मध्य भारत) हैं।
निष्कर्ष :-
पूर्वी भारत में जिन स्थलों से ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों के साक्ष्य मिले हैं (जैसे पाण्डु राजार, ढिबि, महिशाल, सोनपुर, चिराण्ड आदि) उनके बाद के स्तर से लौह उपकरण भी मिल जाते हैं। दक्षिण में वृहत्पाषाणिक समाधियों के स्थल से लौह उपकरण मिलते हैं। इस प्रकार यह दिखाई देता है कि ई. पू. 1000-600 तक भारत के प्रायः सभी भागों में लोहे के अस्त्र-शस्त्रों और उपकरणों का प्रयोग बहुतायत में किया जाने लगा। हस्तिनापुर तथा अतरंजीखेड़ा की खुदाइयों में लौह धातुमल तथा भट्ठियाँ मिलती हैं जिनसे पता चलता है कि यहाँ के निवासी लोहे को गलाकर विविध आकार-प्रकार के उपकरण बनाने में भी निपुण थे। पहले लोहे से युद्ध सम्बन्धी अस्त्र-शस्त्र बनाये गये किन्तु बाद में कृषि सम्बन्धी उपकरणों हंसिया, खुरपी, फाल आदि का भी निर्माण किया जाने लगा। कृषि कार्य में लौह उपकरणों के प्रयोग से अधिकाधिक भूमि को खेती योग्य बनाया गया तथा उत्पादन भी प्रभूत होने लगा।





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